आज जब आइना देखती हूँ तो उसमें मुझे
अपनी माँ की सास की छवि दिखाई देती है
अपने आप से थकी हारी हताश
अपनी सब आशाएँ इच्छाएँ पीछे छोड़ कर
होनी से लड़ती हुई, अनहोनी से डरती हुई
सब ओर से मुँह मोड़ कर अपने आप में समाती हुई
खुद का सामना भी न कर पाने की शर्म को छुपाती हुई
किस चाह की चाह उठे जब चाह ही साथ छोड़ जाए
अकेले वीराने सुनसान में झंझावात की चादर ओढ जाए
आज सोचती हूँ कि काश उनकी उदासीनता
मैं तब भेद पाती
तो आज अपने मन में शायद थोड़ा सुकून तो पाती
अपनी माँ की सास की छवि दिखाई देती है
अपने आप से थकी हारी हताश
अपनी सब आशाएँ इच्छाएँ पीछे छोड़ कर
होनी से लड़ती हुई, अनहोनी से डरती हुई
सब ओर से मुँह मोड़ कर अपने आप में समाती हुई
खुद का सामना भी न कर पाने की शर्म को छुपाती हुई
किस चाह की चाह उठे जब चाह ही साथ छोड़ जाए
अकेले वीराने सुनसान में झंझावात की चादर ओढ जाए
आज सोचती हूँ कि काश उनकी उदासीनता
मैं तब भेद पाती
तो आज अपने मन में शायद थोड़ा सुकून तो पाती

