Saturday, 30 August 2014

सच का सामना, चार साल पहले...

मैं सोचती थी िक "सच का सामना" करने के बाद शो के होस्ट का िजंदगी की ओर नज़रिया कुछ अलग ही होगा । ये जो पिछले कुछ िदनो घटा, माँ की तबियत ख़राब, hospitalisation, और िफ़र उसके बाद उनका अन्तिम संस्कार , इन सब ने मेरे जीवन के नज़रिये पर गहरा असर डाला । कुछ महीने पहले जब परेश अाया था तो कह रहा था कि इतना सब तो देख लिया, लोग सारा जीवन चीज़ों के पीछे भागते रहते है, कुछ पाने की होड़ में लगे रहते हैं, पर अपने दादू दीदा और यहाँ  दादू को देख कर लगा कि इस उम्र में all that matters is िक तुमने कितना प्यार अर्जित िकया, कौन तुम्हारे दुख सुख का भागीदार बनता है । उसकी बात मुझे तब भी सही लगी थी, पर अब तो लगता है कि इतनी छोटी उम्र में उसने जो सार समझा है लोग सारा जीवन लगा कर नहीं समझ पाते ।
कभी लगा ही नहीं िक माँ के जाने के बाद बाबा ऐसे खोए हुए बच्चे की तरह लगेंगे । न कुछ चाहत, न कुछ आशा, बस चुप से कहीं बैठ कर कुछ सोचते रहते हैं या िफर पीठ के पीछे हाथ बाँध कर घर में िनरूद्देशय से घूमते रहते हैं ।
जब भी घर में किसी चीज़ की कमी होती थी माँ जादू से कहीं से निकाल कर दे देतीं थीं । उनके जाने के बाद ख़ाली घर में हम सब आए, जब भी कुछ चाहिए होता है, कहीं न कहीं से िमल ही जाता है । जैसे माँ स्वयं supervise कर रहीं हों कि हम लोगों को कोई तकलीफ़ न हो ।
माँ, आप के जाने से सब ख़ाली हो गया, मन भी और घर भी । अब आप के घर को ऐसे छोड़ कर कैसे जाएँ ?

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